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Thursday, 7 January 2016

सिलसिला

सोते से जग के आइना देखा
तो ये क्या हो गया।
सपने पिघल के दर्पण पे पड़के
चेहरा तेरा बन गया।
दर्पन जो देखा फिर से पकड़ के
साया भी मेरा अब तुझ पे पड़ गया।
साये से खुद के देखा निकलकर
जैसे नाविक कश्ती बहाकर
दूर समुन्दर को ले गया।
सोचा जब मैंने सर को पकड़कर
मेरा सबकुछ पिघलकर
शीशे में ढलकर
चेहरा तेरा ही बनगया।
जल में पिघलके ,
किरणों में चलके
सागर ही मेरा उड़ गया।
तुझमें सवंर के शीशे में ढलके
साया ही मेरा मुझे छल गया।
फिर जब मिला मुझमें तू
बिन बाती दिया ये जल गया।
लगता मुझे क्यों
संकट मेरा सब टल गया
जीवन मुझे अब मिल गया।

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