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Monday, 11 January 2016

मैं वोट हूँ ! या मैं समाज! या पीछे कोई चेहरा।

बह चलूँगा अगर मैं तकदीर ही बदल दूँगा।
अगर तकदीर बदल दी उसदिन..👌 तस्वीर बदल दूँगा।
फिर निकलूंगा सरजमीं पर बाहर तब मैं मैं नहीं होऊंगा।
सोच रहे होंगे न जाने कितने ..पर मैं तो बदल चुका होऊंगा।
उम्मीदें और वायदे रहे होंगे बहुत सारे ..पर वो उससे थे मुझसे नही था कोई।
अभी गुजरने दो कुछ इन सालों को,
फिर मैं बहूँगा और एक नयी तस्वीर बनूँगा ।
आऊंगा फिरसे यहीं पर तुम सब की तकदीर लिखूंगा।
उम्मीदों और वायदों की डोर पर पतंग मैं एक उड़ाऊँगा।
साल दर साल इसे मैं एक एक इंच बढ़ाता जाऊंगा।
साथ तुम्ही सब दोगे मेरा इस पतंग को बढ़ाने में।
और जब पतंगों का मेला हो तो कटने से बचाने में।
आखिर इतना तो करोगे ही तुम सब ,तुम सब हो हमारे ही।
लाखों तस्वीरें बदल चुके हों चाहे ही, पर हैं तो तुम सब के प्यारे ही।
रोज मुखौटा लगाकर घूमें और चेहरे चाहे बदलें सौ। पैदाइस हैं हम यहाँ की ,इस पतंग को दूर आसमान में बढ़ने दो।

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