भुला नहीं हूँ खुद को लेकिन लगता है
रहम आता है खुद पर कि कैसे जीते हैं
जानवर भी खुशनसीब है कितना ,
हम ज़ालिम है इतने
कि खुद में जिन्दा हर शब्द जला देते हैं
जहन में अंदर
फिर जले हुए उन् टुकड़ों को ढूँढ़ते हैं
जातें हैं देखने मीलों दूर तक
मालूम नहीं होता है हमको कि जलन है मन की,
उठ रही है लपटें बार बार ,
हवा,पानी और मिटटी से बुझती नही अंदर की ये आग ,
अगर चूम भी लूँ सारे ज़हर को तो भी अंदर ही मुझमे
फिर कभी जब साँसों से बहा करेंगी धड़कनें
दिल के द्वार पर जब दस्तक दिया करेंगी यादें और महफ़िलें|
तब हम थोड़ा मुस्कुरा दिया करेंगे
अब तो राख ही है सब अंदर उम्र /ज़िंदगी के सैलाब में उसे बहा दिया करेंगे .
ये दाएरे न जाने कितने हैं
हर बार उलट पलट के ..
पर किस्मत ही ऐसी है हर उस शक्श की जो शख्शियत का आइना बनकर उतर आती है सामने
तकल्लुफ हमें करना नहीं होता हर उस नज़र का जो हमें देखती हैं बिन इज़ाज़त के हमारे
पर जहन में वो हर तस्वीर नज़र आती है
चाँद में जैसे सूरज की रौशनी उतर आती है
होती जरूर है वो सूरज की पर वो चाँद की कहलाती है
आती वो चाँद से हैं और धरती पर गिर जाती है
सुकून देती है वो आँखों को
और तुलना जब किसी चाँद जैसे मुखड़े से होती है
चाँद की हर रात ,चांदनी बन जाती है .