Translate

Monday, 18 January 2016

शब्दों का कारवां

आज मेरी  नसों  में  दौड़ता  है  एक  नशा 
होश  में  हूँ  मैं  पर  वक़्त  का  नहीं  कुछ  पता
भुला नहीं हूँ खुद को लेकिन लगता है 
मुझको जिंदगी ने भुला दिया |
रहम आता  है  खुद  पर कि कैसे जीते हैं 
हम सब जानवरों की तरह
जानवर भी खुशनसीब है कितना ,
जी नहीं सकता जो इंसानों की तरह
हम ज़ालिम है इतने
कि खुद में जिन्दा हर शब्द जला देते हैं
जहन में अंदर
फिर  जले  हुए  उन्  टुकड़ों  को  ढूँढ़ते  हैं  
फिर हम  हर  जगह 
जातें  हैं  देखने मीलों दूर तक 
शब्दों  के  पन्नों  का  वो  जलता  हुआ  कारवां
मालूम नहीं होता है हमको कि जलन है मन की, 
तड़प रही है जिन्दगी अन्दर की
उठ रही है लपटें बार बार , 
खूब डाला पानी पर बुझती नहीं ये आग
हवा,पानी और मिटटी से बुझती नही अंदर की ये आग ,
अगर चूम भी लूँ सारे ज़हर को तो भी अंदर ही मुझमे  
रह  जाएगी  ये  आग
फिर  कभी  जब साँसों  से  बहा  करेंगी  धड़कनें
दिल के द्वार पर जब दस्तक दिया करेंगी यादें और महफ़िलें|
तब  हम  थोड़ा  मुस्कुरा  दिया  करेंगे
अब तो राख ही है सब अंदर उम्र /ज़िंदगी के सैलाब में उसे  बहा  दिया  करेंगे .
पूछेंगे  नही  फिर  जहन  से  कि  कहाँ  है  
मेरे  बिखरे  हुए  शब्दों  का  उज़ड़ा  हुआ  संसार /समाज
अगर  मिल  गया  कुछ  तो  रख  लेंगे  नहीं  तो  
बढ़  जाएंगे  आगे  उम्र  को  साथ  लेके .
ये  दाएरे  न  जाने  कितने  हैं  
और  तसवीरें  न  जाने  कितनी  हैं  
शख्शियत  की
हर  बार  उलट  पलट  के .. 
देखा  तो  हम  जरूर  करते  हैं  इस  फ़िराक़  में , 
शायद  हम खुद का चेहरा बना सकेंगे
पर  किस्मत  ही  ऐसी  है  हर  उस  शक्श  की  जो शख्शियत  का  आइना  बनकर  उतर  आती  है  सामने
तकल्लुफ  हमें  करना  नहीं  होता  हर  उस  नज़र  का जो  हमें  देखती  हैं  बिन इज़ाज़त के हमारे
पर  जहन में  वो  हर  तस्वीर  नज़र आती  है  
जब  सोने  नहीं  देती  वो  रातों में  
चाँद  में  जैसे  सूरज  की  रौशनी  उतर  आती  है
होती  जरूर  है  वो  सूरज  की  पर  वो  चाँद  की कहलाती  है
आती  वो  चाँद  से  हैं और धरती पर गिर जाती है
सुकून देती है वो आँखों को 
इसलिए तौली वो खूबसूरती से जाती है
और तुलना जब किसी चाँद जैसे मुखड़े से होती है 
तो वाह क्या खूब कहने
चाँद की हर रात ,चांदनी  बन  जाती  है .

Monday, 11 January 2016

सच्चाई

हर एक इंसान की फितरत
उसे इस बाजार में खड़ा कर देती है जहाँ
मन बेचे जाते हैं।
लोग बोली लगाते हैं प्यार की !और
कौड़ियों के दामों में लोग खुद बिक जाते हैं।
सपने देखे नही जाते यहाँ
खरीदे और बेचे जाते हैं।
पहले जिस्म बिकता था सिर्फ कोठे में
अब तो सरेआम जिस्म बिक जाते हैं।
पहले रेप, बलात्कार और जुर्म औरतों और लड़कियों तक सीमित था
पर अब तो बच्चे ज्यादा शिकार बनाये जाते हैं।
पहले चोर छुपकर किया करते थे चोरी
लेकिन अब चोर ढिंढोरा पीटकर सबकुछ ,पूरा देश तक लूट ले जाते हैं।
कहने को हम समाज में रहने वाले सामाजिक प्राणी हैं इंसान हैं
लेकिन जब कुछ अराजक तत्व दंगा फसाद कराते हैं तब हम सभी इंसानियत की सारी हदें तोड़कर हैवान बन जाते हैं।
दावे तो बड़े लंबे लंबे करतें हैं सब कि भगवान् हैं अंदर हम्मे ! ईश्वर अल्लाह हैं हममें ।
पर जब इस बात का छोटा सा भी परिचय देना होता है हमको।
सब कन्नी काट जाते हैं
और तो और
बेशर्मी की सारी हदें पार कर जातें हैं।
कैसे हैं लोग!ऐसे लोग दुनिया में क्यों आते हैं।

मैं वोट हूँ ! या मैं समाज! या पीछे कोई चेहरा।

बह चलूँगा अगर मैं तकदीर ही बदल दूँगा।
अगर तकदीर बदल दी उसदिन..👌 तस्वीर बदल दूँगा।
फिर निकलूंगा सरजमीं पर बाहर तब मैं मैं नहीं होऊंगा।
सोच रहे होंगे न जाने कितने ..पर मैं तो बदल चुका होऊंगा।
उम्मीदें और वायदे रहे होंगे बहुत सारे ..पर वो उससे थे मुझसे नही था कोई।
अभी गुजरने दो कुछ इन सालों को,
फिर मैं बहूँगा और एक नयी तस्वीर बनूँगा ।
आऊंगा फिरसे यहीं पर तुम सब की तकदीर लिखूंगा।
उम्मीदों और वायदों की डोर पर पतंग मैं एक उड़ाऊँगा।
साल दर साल इसे मैं एक एक इंच बढ़ाता जाऊंगा।
साथ तुम्ही सब दोगे मेरा इस पतंग को बढ़ाने में।
और जब पतंगों का मेला हो तो कटने से बचाने में।
आखिर इतना तो करोगे ही तुम सब ,तुम सब हो हमारे ही।
लाखों तस्वीरें बदल चुके हों चाहे ही, पर हैं तो तुम सब के प्यारे ही।
रोज मुखौटा लगाकर घूमें और चेहरे चाहे बदलें सौ। पैदाइस हैं हम यहाँ की ,इस पतंग को दूर आसमान में बढ़ने दो।

Thursday, 7 January 2016

सिलसिला

सोते से जग के आइना देखा
तो ये क्या हो गया।
सपने पिघल के दर्पण पे पड़के
चेहरा तेरा बन गया।
दर्पन जो देखा फिर से पकड़ के
साया भी मेरा अब तुझ पे पड़ गया।
साये से खुद के देखा निकलकर
जैसे नाविक कश्ती बहाकर
दूर समुन्दर को ले गया।
सोचा जब मैंने सर को पकड़कर
मेरा सबकुछ पिघलकर
शीशे में ढलकर
चेहरा तेरा ही बनगया।
जल में पिघलके ,
किरणों में चलके
सागर ही मेरा उड़ गया।
तुझमें सवंर के शीशे में ढलके
साया ही मेरा मुझे छल गया।
फिर जब मिला मुझमें तू
बिन बाती दिया ये जल गया।
लगता मुझे क्यों
संकट मेरा सब टल गया
जीवन मुझे अब मिल गया।

Tuesday, 5 January 2016

आइना

सोते से जगके आइना पकड़के देखा तो ये क्या हो गया।सपने पिघल के दर्पण पे पड़के चेहरा तेरा बन गया।
दर्पन जो देखा फिर से पकड़के साया भी मेरा अब तुझपे पड़ गया।
साये से खुदके देखा निकलकर जैसे नाविक कश्ती बहाकर दूर समुन्दर को ले गया।
सोचा जब मैंने सर को पकड़कर मेरा सबकुछ पिघलकर शीशे में ढलकर चेहरा तेरा ही बनगया।
जल में पिघलके ,किरणों में चलके सागर ही मेरा उड़गया।
तुझमें सवंरके शीशे में ढलके साया ही मेरा मुझे छल गया।
फिर जब मुझमें मिला तू बिन बाती ये दिया जल गया।
लगता मुझे क्यों संकट मेरा सब टल गया जीवन मुझे अब मिल गया।