हर एक इंसान की फितरत
उसे इस बाजार में खड़ा कर देती है जहाँ
मन बेचे जाते हैं।
लोग बोली लगाते हैं प्यार की !और
कौड़ियों के दामों में लोग खुद बिक जाते हैं।
सपने देखे नही जाते यहाँ
खरीदे और बेचे जाते हैं।
पहले जिस्म बिकता था सिर्फ कोठे में
अब तो सरेआम जिस्म बिक जाते हैं।
पहले रेप, बलात्कार और जुर्म औरतों और लड़कियों तक सीमित था
पर अब तो बच्चे ज्यादा शिकार बनाये जाते हैं।
पहले चोर छुपकर किया करते थे चोरी
लेकिन अब चोर ढिंढोरा पीटकर सबकुछ ,पूरा देश तक लूट ले जाते हैं।
कहने को हम समाज में रहने वाले सामाजिक प्राणी हैं इंसान हैं
लेकिन जब कुछ अराजक तत्व दंगा फसाद कराते हैं तब हम सभी इंसानियत की सारी हदें तोड़कर हैवान बन जाते हैं।
दावे तो बड़े लंबे लंबे करतें हैं सब कि भगवान् हैं अंदर हम्मे ! ईश्वर अल्लाह हैं हममें ।
पर जब इस बात का छोटा सा भी परिचय देना होता है हमको।
सब कन्नी काट जाते हैं
और तो और
बेशर्मी की सारी हदें पार कर जातें हैं।
कैसे हैं लोग!ऐसे लोग दुनिया में क्यों आते हैं।
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Monday, 11 January 2016
सच्चाई
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