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Friday, 18 August 2017

कैंची चली है पन्नों में

इस टूटे हुए दिल पर
अब तुम कैंची चलाओगे क्या?
तलवार भी छू न सकी थी जिसे
तुम फूल 💐 से मिटाओगे क्या?
मुस्कान जो थी पहले
बरकरार वो है अब भी
आँसुओं के खारेपन को
महसूस कराओगे अब क्या?
सूजन नहीं थी दिल की पहले
पर अब जख्म भी सूज गया है
रातों को सपने में आके अब
मेरे सपने भी चुरओगे क्या?
क्या , मेरी जिंदगी में तुम
कभी आओगे क्या?

कुछ कहना है।

वक्त ये तुझको बताकर मैंने लिखा था ।
क्या वक्त ये तूने मुझको जता दिया।
जो आईना मैंने खुद देखा न कभी था।
मेरा ही आईना तूने मुझको दिखा दिया।
मुझमें सिमटते सूने पलों को महसूस किया है मैंने।
मेरी हर सांस को अधूरा बना दिया है।
टूटते पलों की जिन चिंगारियों को समेटा था मैंने।
मेरे आसमां को मेरी जमीं पे ला दिया है।

दिल के अंधेरों में चाँद दिखता था जब कभी।
ख्वाव तेरे चेहरे का पढ़ लेता था मैं मुझमें।
मुस्कान तेरी जो चाँद का नूर बन पड़ती है मुझमें।
कागज के पन्ने बन भी अदृश्य नहीं हो पाता हूँ मैं।
वजूद कैसे खो दूँ खुद का मैं।
देखूँ जब भी तुझे खुद को पाता हूँ मैं ।

Monday, 14 August 2017

मेरे अल्फ़ाज़ शब्द ही थे!

मेरे हर शब्द मेरे अल्फ़ाज़ ,कहते हैं मुझसे।
पढ़कर तो बता कि क्या लिखा है मुझपर तूने।
मेरी परछाईं तक मुझसे यह कहती है कि
छुपकर तो बता अपने साये से तू।
अगर मेरी सोच मेरे हुस्न से जानी जाए
मेरे नाम से पहचानी जाए , तब
मैं सोच लूंगा कि सोच मेरी नहीं मुझसे है।
आँसूं भी मेरे बिक जाएं जब,
स्वाभाविक न रह कर
समय के तकादे में खुद ही बह जाएं जब।
समझ लूंगा मैं
समय की मार बुरी पड़ी है।
एहसास मेरा जब मुझसे
मैं को पूछे,
मेरा दिल भी जब
मेरे मन को टटोले।
लगने लगेगा तब
अंदर कुछ तो हुआ है,
बिन आवाज़ हर सांस का बंधन
अंतः रण से टूटा हुआ है।
रोकने लगे हर दिल आवाज़ जब,
बंधा हुआ समां भी जब टूट जाये।
अंदर झांक कर भी कुछ न मिले जब मुझको।
समझ जाना कि मेरा मैं मुझसे रूठा हुआ है।