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Tuesday, 5 January 2016

आइना

सोते से जगके आइना पकड़के देखा तो ये क्या हो गया।सपने पिघल के दर्पण पे पड़के चेहरा तेरा बन गया।
दर्पन जो देखा फिर से पकड़के साया भी मेरा अब तुझपे पड़ गया।
साये से खुदके देखा निकलकर जैसे नाविक कश्ती बहाकर दूर समुन्दर को ले गया।
सोचा जब मैंने सर को पकड़कर मेरा सबकुछ पिघलकर शीशे में ढलकर चेहरा तेरा ही बनगया।
जल में पिघलके ,किरणों में चलके सागर ही मेरा उड़गया।
तुझमें सवंरके शीशे में ढलके साया ही मेरा मुझे छल गया।
फिर जब मुझमें मिला तू बिन बाती ये दिया जल गया।
लगता मुझे क्यों संकट मेरा सब टल गया जीवन मुझे अब मिल गया।

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