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Friday, 18 August 2017

कुछ कहना है।

वक्त ये तुझको बताकर मैंने लिखा था ।
क्या वक्त ये तूने मुझको जता दिया।
जो आईना मैंने खुद देखा न कभी था।
मेरा ही आईना तूने मुझको दिखा दिया।
मुझमें सिमटते सूने पलों को महसूस किया है मैंने।
मेरी हर सांस को अधूरा बना दिया है।
टूटते पलों की जिन चिंगारियों को समेटा था मैंने।
मेरे आसमां को मेरी जमीं पे ला दिया है।

दिल के अंधेरों में चाँद दिखता था जब कभी।
ख्वाव तेरे चेहरे का पढ़ लेता था मैं मुझमें।
मुस्कान तेरी जो चाँद का नूर बन पड़ती है मुझमें।
कागज के पन्ने बन भी अदृश्य नहीं हो पाता हूँ मैं।
वजूद कैसे खो दूँ खुद का मैं।
देखूँ जब भी तुझे खुद को पाता हूँ मैं ।

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