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Monday, 14 August 2017

मेरे अल्फ़ाज़ शब्द ही थे!

मेरे हर शब्द मेरे अल्फ़ाज़ ,कहते हैं मुझसे।
पढ़कर तो बता कि क्या लिखा है मुझपर तूने।
मेरी परछाईं तक मुझसे यह कहती है कि
छुपकर तो बता अपने साये से तू।
अगर मेरी सोच मेरे हुस्न से जानी जाए
मेरे नाम से पहचानी जाए , तब
मैं सोच लूंगा कि सोच मेरी नहीं मुझसे है।
आँसूं भी मेरे बिक जाएं जब,
स्वाभाविक न रह कर
समय के तकादे में खुद ही बह जाएं जब।
समझ लूंगा मैं
समय की मार बुरी पड़ी है।
एहसास मेरा जब मुझसे
मैं को पूछे,
मेरा दिल भी जब
मेरे मन को टटोले।
लगने लगेगा तब
अंदर कुछ तो हुआ है,
बिन आवाज़ हर सांस का बंधन
अंतः रण से टूटा हुआ है।
रोकने लगे हर दिल आवाज़ जब,
बंधा हुआ समां भी जब टूट जाये।
अंदर झांक कर भी कुछ न मिले जब मुझको।
समझ जाना कि मेरा मैं मुझसे रूठा हुआ है।

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