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Tuesday, 24 March 2015

गीत

यह गीत लिखा था मैने तब, जब फूल पानी की जगह बरसते थे
यह गीत लिखा था मैने तब, जब आँसू खुशियों के लिए टपकते थे
यह गीत लिखा था मैने तब, जब दुनिया लोगों मे बसती थी 
यह गीत लिखा था मैने तब, जब इंसानियत सबसे बड़ी हस्ती थी
क्या गीत था वो, जब भौंरे फूलों के लिए उड़ जाते थे फूलों के चारों ओर घूम घूमकर जब वो गीत गुनगुनाते थे 
मधुमक्खियाँ जिनपर बैठतीं और उनके रस से शहद का घर बनाती थीं दूर दूर से उड़कर आतीं हर फूल पर बैठ जाती फिर भिन भिन करके गुनगुनाती और फिर फुर्र फुर्र करती दूसरे सफ़र के लिए निकल जाती ये कुदरत भी क्या खूब कमाल दिखाती
क्या गीत था वो ,जिससे पराए भी अपने हो जाते थे
याद ऩही आ रहा मुझे वो गीत ,वो गीत जिसमे वो जादू था
वो कासिष थी वो रौब था वो मिठास थी और जो मेरा गुरूर था
जो किसी भी बहते झरने की खूबसूरती को और बढ़ा दे
जो इंसान को खुद की कद्र सीखा दे जो भूखे को रोटी का रास्ता बता दे जो सूखे मे पानी की राह जगा दे
जो खून चूसने वाले मच्छरों को फूलों का रस पान करने वाली मक्खियाँ बना दे, गीत गाने वाले भौरे बना दे
और खून चूसने वाली जनजाति को इंसान बना दे
मेरा ये गीत वो गहना है जो जन्मजात सभी के पास होता और बहुत अमोल्य भी, हर रूप मे ढल जाता है लेकिन सम्हाल कर रख पाना इसे आसान नही होता ,ठोकर लगते ही बिखर जाता है और बड़ी मुश्किल से बटुरता है ये इतना अमूल्य है कि ये कभी दिखता नही और इसलिए कोई कभी इसे चुरा नही सकता और अगर खो गया तो कोई इससे ला नही सकता इसके सामने दुनिया की हर चीज़ छोटी है ये मेरी इज़्ज़त है ये मेरी आबरू है ये मेरी दुनिया है
जैसे दौलत को और मोहब्बत को एक तराजू मे तौला नही जा सकता वैसे ही इस गहने को दुनिया की किसी भी चीज़ से बदल नही सकते क्यूंकी ये वो गीत है जो ना लिखा गया जो ना ही पढ़ा गया और ना सुना गया लेकिन वजूद इसका इतना बड़ा है की सबकुछ बेमानी सा लगता है
osho

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